Sunday, 23 February 2025

आखिरी सांस तक साहित्य साधना से जुड़े रहे जनाब कृष्णबिहारी ’नूर’

 First Published on Tuesday 27th May 2023 at 5:45 PM Updated By Krishan Kumar Naaz on 14th February 2025 

जनाब कृष्ण कुमार नाज़ साहिब ने बताई नूर साहिब की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी नई बातें 

उनकी शायरी ज़िंदगी की कठिनइयों से हमेशां रूबरू रही 


साहित्य की दुनिया से21 फरवरी 2025: (मीडिया लिंक डेस्क//साहित्य स्क्रीन)::

यह एक हकीकत है कि लेखकों की दुनिया अलग सी होती है और उसके पात्र भी अलग से होते हैं। आम दुनिया और उनका परिवार भी आम तौर पर इसे कभी पूरी तरह नहीं समझ पाता। शायर या लेखक भगवान की तरह एक कहानी नहीं एक दुनिया भी रच डालते हैं।  लेखकों की रचनाओं को पढ़ते हुए हमें लगता है कि हम किसी और दुनिया की कोई ऐसी कहानी पढ़ रहे हैं जो हमारे आसपास भी महसूस होती है। इसी तरह शायरों के शेर भी अलग अलग कहानी से जुड़े होते हैं। यह कहानियां दिलचस्प ही होती हैं और दर्द भरी भी। काल्पनिक भी और सच्ची भी। कुछ ऐसी ही कहानी इस पोस्ट के संबंध में भी है। आज सुनाते हैं आपको इसी पोस्ट का एक संक्षिप्त सा किस्सा। जो आपको संपादकीय ज़िम्मेदारियों की एक छोटी सी झलक भी दिखाएगा। 

यह कहानी सन 2023 के अप्रैल महीने में हमारे पास पहुंची थी। संपादकीय स्टाफ के सभी सदस्य जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहिब की शायरी के फैन थे। इसलिए उन के संबंध में जानना और लिखना सभी की इच्छा भी थी।  संपादकीय डेस्क के सबंधित स्टाफ के पास कुछ और लोगों ने भी जनाब कृष्ण बिहारी नूर के संबंध में लिखा। मैगज़ीन सैक्शन ने इन सभी को मिला कर एक स्टोरी बना दिया क्यूंकि बहुत से लोगों ने काफी कुछ रिपीट भी कर रखा था। आखिरकार इस सारे झमेले में पोस्ट प्रकाशित भी हो गई। 

जब इसे पोस्ट किए कई महीने बीत गए तो संपादकीय स्टाफ की बात इत्तफाकन मोरादाबाद के रहने वाले जानेमाने शायर कृष्णा कुमार नाज़ साहिब से हुई। विषय तो कोई और था लेकिन चलते चलते बात जनाब कृष्ण बिहारी नाज़ साहिब और उनकी शायरी पर आ गई। उनकी ज़िंदगी, शायरी और आखिरी दिनों पर चर्चा करते हुए नाज़ साहिब ने नूरसाहिब के संबंध में बहुत सी नै और ख़ास बातें बतायीं। संपादकीय डेस्क को यह बातें महत्वपूर्ण लगीं। संपादकीय स्टाफ के विशेष अनुरोध पर नाज़ साहिब ने नूर साहिब पर कुछ विशेष लिख कर भी भेजा। 

जनाब कृष्ण कुमार नाज़ साहिब इस चर्चा के दौरान जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहिब की यादों को ताज़ा करते हुए बताते हैं कि जब आखिरी वक्त की घडियां नज़दीक आने को हुईं तो वह उस समय भी शायरी के इश्क में थे। मई, 2003 में नूर साहब एक मुशायरे में शामिल होने के लिए लखनऊ से गाजियाबाद जा रहे थे। जोश और उत्साह हमेशां उनके जीवन में बहुत गहरे मित्र की तरह साथ रहा। उस दिन भी उनके तन मन का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। गंभीरता और जोश बहुत खूबसूरत स्वभाव था।

लखनऊ से गाज़ियाबाद तक के उस ट्रेन वाले सफ़र के लिए उन्हें उस दिन भी ऊपर वाली सीट ही मिली थी। ऊपर की सीट का एक फायदा रहता है कि नीचे वाला कोलाहल दिमाग और शायरी के लिए आवश्यक एकाग्रता को कभी भंग नहीं करता। हालांकि उतरने और चढने में होने वाले कष्ट के कारण ज़्यादातर लोग ऊपर की सीट को पसंद भी नहीं करते। वृद्ध उम्र में तो और भी ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन नूर साहिब को एकाग्रता के कारण ऊपर वाली सीट पसंद भी थी। हमेशा इसे प्राथमिकता दिया करते। उस दिन तो यह सब बहाना ही बन गया।

आखिरी सफ़र बनने वाली उस ट्रेन में ऊपर की सीट से नीचे उतरते समय गिर जाने से उनके पेट में चोट आ गई। लेकिन उन्होंने चोट की परवाह न करते हुए अगले दिन मुशायरे में भी शिरकत की। पहले की तरह बातें भी की। किसी को भी अनहोनी का अंदेशा तक नहीं था। 

उन्हें रूटीन में देख कर उस दिन तो बात आई गई हो गई लेकिन अगले दिन उन्हें यशोदा अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी आंत का आपरेशन हुआ। कुछ दिन वहां भर्ती रहने के बाद 30 मई को नूर साहब सभी को छोड़कर अनंत यात्रा पर चले गए। उनका अंतिम संस्कार भी गाजियाबाद में ही किया गया। 

उनकी देह तो चली गई, लेकिन उनकी शायरी ने एक नया सफ़र शुरू किया। यह शायरी तेज़ी से लोगों के दिलों तक पहुंचने लगी। ज़िंदगी की मुश्किलों का बेबाकी से बखान करती शायरी आज भी लोगों की जुबां पर है। यह सब उनकी साहित्य साधना का ही परिणाम है। इसी साधना में छिपे हैं उनके ख़ास गुण भी। 
 
उल्लेखनीय है कि ज़मीन से जुड़े हुए जाने माने शायर जनाब कृष्णबिहारी नूर की साहित्य साधना भी कमाल की रही। बिना किसी का अहसान लिए, बिना किसे से गुजारिशें किए, बिना किसी के आगे सिर झुकाए ज़िंदगी के रंगों को देखते रहे जनाब  नूर साहिब। सिर्फ देखते ही नहीं रहे बल्कि उन अनुभूतियों को दिल और दिमाग में भी सहेजते रहे। योग साधना और तंत्र साधना में साधक बहुत  क्रियाओं और बेहद कठिन आसनों के अभ्यास से सहजता की स्थिति को उपलब्ध होते हैं। इस  सहज अवस्था में पहुँचने के बाद वे अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति भी देते हैं। ये अनुभूतियाँ शरीर और दुनिया में रहते हुए भी इनसे अलग होने का अहसास भी करवाती हैं। 

जब वह कहते हैं: 
ज़िंदगी अब बता किधर जाएं?
ज़हर बाजार में मिला ही नहीं!

हो सकता है ज़िंदगी के आनंद, सुख सुविधा, अमीरी और विकास के दावे करने वाले अपनी जगह सही हों, लेकिन नूर साहिब तो ज़िंदगी में दुख, दर्द और गम का विष पी रहे हैं। नूर साहिब उस ज़िंदगी की बात करते हुए कहते अपने शायराना अंदाज़ में कहते हैं:

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं! 
और क्या जुर्म है, पता ही नहीं

तो आजकल के दौर की ज़िंदगी की सभी मुश्किलों की  तरफ बहुत ही सलीके से इशारा कर जाते हैं। जीना भी कठिन है और मरना भी मुश्किल--कितनी गहन मजबूरी है! उनकी शायरी पढ़ते जा सुनते हुए इस बात का अहसास बहुत बार होता है। 

उनका इस दुनिया में जन्म 29 अगस्त 1954 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की बांसगाँव तहसील (अब खजनी) अन्तर्गत ग्राम कुण्डाभरथ में  हुआ। लगता है इस जन्म से पहले वह निश्चित ही किसी और दुनिया में भी रहे होंगे। उनकी शायरी पढ़ते हुए अहसास होता है कि उनकी शिक्षा की औपचारिकता भी पूरी शिद्दत से हुई। 

कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम. ए. किया। सन 1968-69 से लेखन की शुरुआत हुई। पहली कहानी सन 1971में प्रकाशित हुई और उनका नाम कहानीकारों में भी उभर कर सामने आया। तबसे सैकड़ों रचनाएँ हिन्दुस्तान के प्रमुख समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। यूट्यूब पर उनके मुशायरे भी मिल जाएंगे। अनेक प्रकार की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के सदस्य और इमारात में हिन्दी के विकास में संलग्न रहे। संप्रति संयुक्त अरब इमारात के अबूधाबी नगर में अध्यापन के व्यवसाय में हैं। उनकी रचनाएं आज भी बहुत से लोगों के दिलों में हैं। उनकी शायरी सीधा दिल में उतरती है। इसके साथ ही ज़िंदगी के रूबरू भी करवाती है। 

उनकी प्रकशित कृतियों में कुछ नाम आज भी विशेष हैं:

कहानी संग्रहों में हैं : दो औरतें, पूरी हक़ीकत पूरा फ़साना, नातूर।

एकांकी नाटक में हैं: यह बहस जारी रहेगी, एक दिन ऐसा होगा, गांधी के देश में

नाटक की दुनिया में हैसंगठन के टुकड़े

कविता संग्रह में: मेरे मुक्तक : मेरे गीत, मेरे गीत तुम्हारे हैं, मेरी लम्बी कविताएँ,

उपन्यास: रेखा उर्फ नौलखिया, पथराई आँखों वाला यात्री, पारदर्शियाँ।

यात्रा वृतांत: सागर के इस पार से उस पार से।

गौरतलब है कि "दो औरतें" कहानी का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रॉमा दिल्ली द्वारा श्री देवेंन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में सन 1996 में जो मंचन हुआ वह बेहद लोकप्रिय हुआ। अखबार और रेडियो की दुनिया से संबद्ध रहने के बाद सत्रह वर्षों से भी अधिक समय तक अध्यापन से भी जुड़े रहे। इसे इस रूप में भी बेहद पसंद किया गया। 

कृष्ण बिहारी नूर साहिब की बहुत सी शायरी विभिन्न वेबसाईट पर भी देखी जा सकती है। उनके लिए अलग से भी एक समर्पित वेबसाईट बनाने के प्रयास चले थे लेकिन इनके बारे में ज़्यादा पता नहीं चल सका। आखिर में एक बात और कि वह आखिरी सांस तक शायरी और मुशायरे के लिए समर्पित रहे। ऐसे ही हुआ करते हैं कलम के सिपाही। 

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Sunday, 16 February 2025

पुलवामा के शहीद//कृष्णा गोयल

Saturday 15th February 2025 Remembering Pulwama Attack Sahitya Screen साहित्य स्क्रीन

देश हित कुर्बानी के लिए एक नया इतिहास रचा पुलवामा के शहीदों ने 


मोहाली
: 14 फरवरी 2025: (कृष्णा गोयल//AI Gemini// मीडिया लिंक डेस्क//साहित्य स्क्रीन)::

दिल हिला देने वाली यह एक सच्ची कहानी है जिसकी याद आते ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। इसकी चर्चा करने पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बताती है कि जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को एक आतंकी हमला हुआ था, जिसमें भारत के 40 जवान शहीद हो गए थे। यह हमला दोपहर के लगभग 3 बजे हुआ था।


क्या था पूरा मामला? जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को एक आत्मघाती हमलावर ने सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाया था। इस हमले में 40 जवान शहीद हो गए थे। यह हमला उस समय हुआ था, जब सीआरपीएफ का काफिला जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजर रहा था। काफिले में 78 वाहन थे और उनमें लगभग 2,500 जवान सवार थे। हमलावर ने विस्फोटकों से भरी एक कार को काफिले के एक वाहन से टकरा दिया था, जिससे विस्फोट हुआ और 40 जवान शहीद हो गए। इस हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद नामक एक आतंकी संगठन ने ली थी। 

भारत का एक्शन: इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर हवाई हमले किए थे। भारत सरकार ने इस हमले को 'सर्जिकल स्ट्राइक 2' का नाम दिया था। इस हमले में कई आतंकियों के मारे जाने की खबर थी।

एक बार फिर 14 फरवरी 

पुलवामा के शहीदों की याद आते ही उनके परिजनों की भी  याद आती है... उनकी मां, उनके पिता,उनकी संतान, उनकी पत्नी, --क्या बीती होगी उन सभी पर...! इस असहनीय दुःख की कल्पना ही संवेनदशील लोगों को भावुक कर देती है। दुःख और गम की इसी लहर के चलते शायरा ने एक काव्य रचना प्रेषित की है जिसे हम साहित्य स्क्रीन पढ़ने वाले पाठकों के लिए यहां  प्रकाशित कर रहे हैं। 

Courtesy>Sunil Shah Profile

लीजिए पढ़िए कृष्णा गोयल की काव्य रचना पुलवामा 

तुम्हारे चिथड़े चिथड़े देख कर

रो पड़ा देश सारा,

केसे बताया तुम्हारी मां को

जिसका तू लाडला

आंख का तारा!

केसे ढाढस बंधाया तेरे पिता को

जिसका तू बुढ़ापे का सहारा!


कैसे बताया तेरे भाई को

जिसका तू दायां हाथ था,

जिसकी हर गुरबत में

तेरा साथ था!


तुम्हारी प्यारी विवाहिता

तुम्हारी आरती उतारती थी,

तुम्हारी फोटो ले ले कर

अपने चाव उतारती थी।

दिल चाहे उसके आंसू पी जाएं

पर कैसे उसको धीर बंधाए?

जो शांत कर दें उसको,

वो शब्द कहां से लाएं?


उस नन्ही जान का

 दुख केसे बांटेंगे?

जो तोतली जुबान में बोलती है

पापा मेरी doll लेकर लौटेंगे।

 

जिस बहन को तुमने

डोली में था बिठाना,

बार बार बेहोश होकर गिरती है

उसके सदमे का क्या ठिकाना!


फरवरी का जब ये सप्ताह आता है,

दिल घबराता है,

लाडले वीरों के याद करके

कलेजा मुंह को आता है।


आज सब का मन डोलता है,

खून सब का खौलता है,

कोई वंदे मातरम

कोई जय जवान बोलता है।


कुछ सोच कुछ तदबीर बनाएं,

मिलजुल कर कसमें खाएं,

इस से पहले कि कोई आंख उठाए

फोड़ दें वह आंखें

अलख मुकाएं।

 

एक नहीं  40 घरों में

अंधेरा छा गया,

आज वही 14 फरवरी

का दिन आ गया!


कसम है तेरे चिथड़ों की

उनको न भुलायेंगे

अब और नही, अब और नही

दुश्मन को और सह नहीं पाएंगे

बच्चे बच्चे में स्वाभिमान जगाएंगे

जो देखेगा बुरी नजर से

फोड़ देंगे वो आंख

सिर धड़ से उड़ाएंगे!


भारत मां के लाडलो!

हर दिल पे खुदा तुम्हारा नाम है,

शत शत प्रणाम तुम्हे

शत शत प्रणाम है।

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कृष्णा गोयल

पूर्व ज्वाइंट रजिस्ट्रार AFT

14 फरवरी 2025

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