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Sunday, 23 February 2025

आखिरी सांस तक साहित्य साधना से जुड़े रहे जनाब कृष्णबिहारी ’नूर’

 First Published on Tuesday 27th May 2023 at 5:45 PM Updated By Krishan Kumar Naaz on 14th February 2025 

जनाब कृष्ण कुमार नाज़ साहिब ने बताई नूर साहिब की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी नई बातें 

उनकी शायरी ज़िंदगी की कठिनइयों से हमेशां रूबरू रही 


साहित्य की दुनिया से: 21 फरवरी 2025: (मीडिया लिंक डेस्क//साहित्य स्क्रीन)::

यह एक हकीकत है कि लेखकों की दुनिया अलग सी होती है और उसके पात्र भी अलग से होते हैं। आम दुनिया और उनका परिवार भी आम तौर पर इसे कभी पूरी तरह नहीं समझ पाता। शायर या लेखक भगवान की तरह एक कहानी नहीं एक दुनिया भी रच डालते हैं।  लेखकों की रचनाओं को पढ़ते हुए हमें लगता है कि हम किसी और दुनिया की कोई ऐसी कहानी पढ़ रहे हैं जो हमारे आसपास भी महसूस होती है। इसी तरह शायरों के शेर भी अलग अलग कहानी से जुड़े होते हैं। यह कहानियां दिलचस्प ही होती हैं और दर्द भरी भी। काल्पनिक भी और सच्ची भी। कुछ ऐसी ही कहानी इस पोस्ट के संबंध में भी है। आज सुनाते हैं आपको इसी पोस्ट का एक संक्षिप्त सा किस्सा। जो आपको संपादकीय ज़िम्मेदारियों की एक छोटी सी झलक भी दिखाएगा। 

यह कहानी सन 2023 के अप्रैल महीने में हमारे पास पहुंची थी। संपादकीय स्टाफ के सभी सदस्य जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहिब की शायरी के फैन थे। इसलिए उन के संबंध में जानना और लिखना सभी की इच्छा भी थी।  संपादकीय डेस्क के सबंधित स्टाफ के पास कुछ और लोगों ने भी जनाब कृष्ण बिहारी नूर के संबंध में लिखा। मैगज़ीन सैक्शन ने इन सभी को मिला कर एक स्टोरी बना दिया क्यूंकि बहुत से लोगों ने काफी कुछ रिपीट भी कर रखा था। आखिरकार इस सारे झमेले में पोस्ट प्रकाशित भी हो गई। 

जब इसे पोस्ट किए कई महीने बीत गए तो संपादकीय स्टाफ की बात इत्तफाकन मोरादाबाद के रहने वाले जानेमाने शायर कृष्णा कुमार नाज़ साहिब से हुई। विषय तो कोई और था लेकिन चलते चलते बात जनाब कृष्ण बिहारी नाज़ साहिब और उनकी शायरी पर आ गई। उनकी ज़िंदगी, शायरी और आखिरी दिनों पर चर्चा करते हुए नाज़ साहिब ने नूरसाहिब के संबंध में बहुत सी नै और ख़ास बातें बतायीं। संपादकीय डेस्क को यह बातें महत्वपूर्ण लगीं। संपादकीय स्टाफ के विशेष अनुरोध पर नाज़ साहिब ने नूर साहिब पर कुछ विशेष लिख कर भी भेजा। 

जनाब कृष्ण कुमार नाज़ साहिब इस चर्चा के दौरान जनाब कृष्ण बिहारी नूर साहिब की यादों को ताज़ा करते हुए बताते हैं कि जब आखिरी वक्त की घडियां नज़दीक आने को हुईं तो वह उस समय भी शायरी के इश्क में थे। मई, 2003 में नूर साहब एक मुशायरे में शामिल होने के लिए लखनऊ से गाजियाबाद जा रहे थे। जोश और उत्साह हमेशां उनके जीवन में बहुत गहरे मित्र की तरह साथ रहा। उस दिन भी उनके तन मन का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। गंभीरता और जोश बहुत खूबसूरत स्वभाव था।

लखनऊ से गाज़ियाबाद तक के उस ट्रेन वाले सफ़र के लिए उन्हें उस दिन भी ऊपर वाली सीट ही मिली थी। ऊपर की सीट का एक फायदा रहता है कि नीचे वाला कोलाहल दिमाग और शायरी के लिए आवश्यक एकाग्रता को कभी भंग नहीं करता। हालांकि उतरने और चढने में होने वाले कष्ट के कारण ज़्यादातर लोग ऊपर की सीट को पसंद भी नहीं करते। वृद्ध उम्र में तो और भी ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन नूर साहिब को एकाग्रता के कारण ऊपर वाली सीट पसंद भी थी। हमेशा इसे प्राथमिकता दिया करते। उस दिन तो यह सब बहाना ही बन गया।

आखिरी सफ़र बनने वाली उस ट्रेन में ऊपर की सीट से नीचे उतरते समय गिर जाने से उनके पेट में चोट आ गई। लेकिन उन्होंने चोट की परवाह न करते हुए अगले दिन मुशायरे में भी शिरकत की। पहले की तरह बातें भी की। किसी को भी अनहोनी का अंदेशा तक नहीं था। 

उन्हें रूटीन में देख कर उस दिन तो बात आई गई हो गई लेकिन अगले दिन उन्हें यशोदा अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी आंत का आपरेशन हुआ। कुछ दिन वहां भर्ती रहने के बाद 30 मई को नूर साहब सभी को छोड़कर अनंत यात्रा पर चले गए। उनका अंतिम संस्कार भी गाजियाबाद में ही किया गया। 

उनकी देह तो चली गई, लेकिन उनकी शायरी ने एक नया सफ़र शुरू किया। यह शायरी तेज़ी से लोगों के दिलों तक पहुंचने लगी। ज़िंदगी की मुश्किलों का बेबाकी से बखान करती शायरी आज भी लोगों की जुबां पर है। यह सब उनकी साहित्य साधना का ही परिणाम है। इसी साधना में छिपे हैं उनके ख़ास गुण भी। 
 
उल्लेखनीय है कि ज़मीन से जुड़े हुए जाने माने शायर जनाब कृष्णबिहारी नूर की साहित्य साधना भी कमाल की रही। बिना किसी का अहसान लिए, बिना किसे से गुजारिशें किए, बिना किसी के आगे सिर झुकाए ज़िंदगी के रंगों को देखते रहे जनाब  नूर साहिब। सिर्फ देखते ही नहीं रहे बल्कि उन अनुभूतियों को दिल और दिमाग में भी सहेजते रहे। योग साधना और तंत्र साधना में साधक बहुत  क्रियाओं और बेहद कठिन आसनों के अभ्यास से सहजता की स्थिति को उपलब्ध होते हैं। इस  सहज अवस्था में पहुँचने के बाद वे अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति भी देते हैं। ये अनुभूतियाँ शरीर और दुनिया में रहते हुए भी इनसे अलग होने का अहसास भी करवाती हैं। 

जब वह कहते हैं: 
ज़िंदगी अब बता किधर जाएं?
ज़हर बाजार में मिला ही नहीं!

हो सकता है ज़िंदगी के आनंद, सुख सुविधा, अमीरी और विकास के दावे करने वाले अपनी जगह सही हों, लेकिन नूर साहिब तो ज़िंदगी में दुख, दर्द और गम का विष पी रहे हैं। नूर साहिब उस ज़िंदगी की बात करते हुए कहते अपने शायराना अंदाज़ में कहते हैं:

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं! 
और क्या जुर्म है, पता ही नहीं

तो आजकल के दौर की ज़िंदगी की सभी मुश्किलों की  तरफ बहुत ही सलीके से इशारा कर जाते हैं। जीना भी कठिन है और मरना भी मुश्किल--कितनी गहन मजबूरी है! उनकी शायरी पढ़ते जा सुनते हुए इस बात का अहसास बहुत बार होता है। 

उनका इस दुनिया में जन्म 29 अगस्त 1954 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की बांसगाँव तहसील (अब खजनी) अन्तर्गत ग्राम कुण्डाभरथ में  हुआ। लगता है इस जन्म से पहले वह निश्चित ही किसी और दुनिया में भी रहे होंगे। उनकी शायरी पढ़ते हुए अहसास होता है कि उनकी शिक्षा की औपचारिकता भी पूरी शिद्दत से हुई। 

कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम. ए. किया। सन 1968-69 से लेखन की शुरुआत हुई। पहली कहानी सन 1971में प्रकाशित हुई और उनका नाम कहानीकारों में भी उभर कर सामने आया। तबसे सैकड़ों रचनाएँ हिन्दुस्तान के प्रमुख समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। यूट्यूब पर उनके मुशायरे भी मिल जाएंगे। अनेक प्रकार की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के सदस्य और इमारात में हिन्दी के विकास में संलग्न रहे। संप्रति संयुक्त अरब इमारात के अबूधाबी नगर में अध्यापन के व्यवसाय में हैं। उनकी रचनाएं आज भी बहुत से लोगों के दिलों में हैं। उनकी शायरी सीधा दिल में उतरती है। इसके साथ ही ज़िंदगी के रूबरू भी करवाती है। 

उनकी प्रकशित कृतियों में कुछ नाम आज भी विशेष हैं:

कहानी संग्रहों में हैं : दो औरतें, पूरी हक़ीकत पूरा फ़साना, नातूर।

एकांकी नाटक में हैं: यह बहस जारी रहेगी, एक दिन ऐसा होगा, गांधी के देश में

नाटक की दुनिया में है: संगठन के टुकड़े

कविता संग्रह में: मेरे मुक्तक : मेरे गीत, मेरे गीत तुम्हारे हैं, मेरी लम्बी कविताएँ,

उपन्यास: रेखा उर्फ नौलखिया, पथराई आँखों वाला यात्री, पारदर्शियाँ।

यात्रा वृतांत: सागर के इस पार से उस पार से।

गौरतलब है कि "दो औरतें" कहानी का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रॉमा दिल्ली द्वारा श्री देवेंन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में सन 1996 में जो मंचन हुआ वह बेहद लोकप्रिय हुआ। अखबार और रेडियो की दुनिया से संबद्ध रहने के बाद सत्रह वर्षों से भी अधिक समय तक अध्यापन से भी जुड़े रहे। इसे इस रूप में भी बेहद पसंद किया गया। 

कृष्ण बिहारी नूर साहिब की बहुत सी शायरी विभिन्न वेबसाईट पर भी देखी जा सकती है। उनके लिए अलग से भी एक समर्पित वेबसाईट बनाने के प्रयास चले थे लेकिन इनके बारे में ज़्यादा पता नहीं चल सका। आखिर में एक बात और कि वह आखिरी सांस तक शायरी और मुशायरे के लिए समर्पित रहे। ऐसे ही हुआ करते हैं कलम के सिपाही। 

इसी संबंध में आप पुरानी पोस्ट पढ़ सकते हैं बस यहाँ क्लिक करके

निरंतर सामाजिक चेतना और जनहित ब्लॉग मीडिया में योगदान दें। हर दिन, हर हफ्ते, हर महीने या कभी-कभी इस शुभ कार्य के लिए आप जो भी राशि खर्च कर सकते हैं, उसे अवश्य ही खर्च करना चाहिए। आप इसे नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके आसानी से कर सकते हैं।

Thursday, 8 February 2024

आखिरी सांस तक साहित्य साधना से जुड़े रहे जनाब कृष्ण बिहारी नूर

Tuesday 27th May 2023 at 5:45 PM

उनकी शायरी ज़िंदगी की कठिनइयों से हमेशां रूबरू रही 


साहित्य की दुनिया से
: 30 मई 2023: (मीडिया लिंक डेस्क//साहित्य स्क्रीन)::

जब आखिरी वक्त की घडियां नज़दीक आने को हुईं तो वह उस समय भी शायरी के इश्क में थे। मई, 2003 में नूर साहब एक मुशायरे में शामिल होने के लिए लखनऊ से गाजियाबाद जा रहे थे। जोश और उत्साह हमेशां उनके जीवन में बहुत गहरे मित्र की तरह साथ रहा। उस दिन भी उनके तन मन का माहौल भी कुछ ऐसा ही था। गंभीरता और जोश बहुत खूबसूरत स्वभाव था। 

सफ़र के लिए उन्हें उस दिन भी ऊपर वाली सीट ही मिली थी। ऊपर की सीट का एक फायदा रहता है कि नीचे वाला कोलाहल दिमाग और शायरी के लिए आवश्यक एकाग्नरता को कभी भंग नहीं करता। हालांकि उतरने और चढने में होने वाले कष्ट के कारण ज़्यादातर लोग ऊपर की सीट को पसंद भी नहीं करते। वृद्ध उम्र में तो और भी ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन नूर साहिब को एकाग्रता के कारण ऊपर वाली सीट पसंद भी थी। हमेशा इसे प्राथमिकता दिया करते। उस दिन तो यह सब बहाना ही बन गया। 

आखिरी सफ़र बनने वाली उस ट्रेन में ऊपर की सीट से नीचे उतरते समय गिर जाने से उनके पेट में चोट आ गई। लेकिन उन्होंने चोट की परवाह न करते हुए अगले दिन मुशायरे में भी शिरकत की। पहले की तरह बातें भी की। किसी को भी अनहोनी का अंदेशा तक नहीं था। 

उन्हें रूटीन में देख कर उस दिन तो बात आई गई हो गई लेकिन मुशायरे के अगले दिन 30 मई को नूर साहब सभी को छोड़कर अनंत यात्रा पर चले गए। उनका अंतिम संस्कार भी गाजियाबाद में ही किया गया। उनका जाना देह का नत तो था लेकिन उनकी शायरी ने एक नया सफ़र शुरू किया। यह शायरी तेज़ी से लोगों के दिलों तक पहुंचने लगी। ज़िंदगी की मुश्किलों का बेबाकी से बखान करती शायरी आज भी लोगों की जुबां पर है। यह सब उनकी साहित्य साधना का ही परिणाम है। इसी साधना में छिपे हैं उनके ख़ास गुण भी।  

उल्लेखनीय है कि ज़मीन से जुड़े हुए जानेमाने शायर जनाब कृष्णबिहारी नूर की साहित्य साधना भी कमाल की रही। बिना किसी का अहसान लिए, बिना किसे से गुजारिशें किए, बिना किसी के आगे सिर झुकाए इन्दगी के रंगों को देखते रहे जनाब  नूर साहिब। सिर्फ देखते  उन अनुभूतियों की दिल और दिमाग में सहेजते रहे। योग साधना और तंत्र साधना में साधक बहुत  क्रियाओं और बेहद कठिन आसनों के अभ्यास से सहजता की स्थिति को उपलब्ध होते हैं। इस  सहज अवस्था में पहुँचने के बाद वे अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति भी देते हैं। यह अनुभूतियाँ शरीर और दुनिया में रहते हुए भी इनसे अलग होने का अहसास भी करवाती हैं। 

जब वह कहते हैं: 

ज़िंदगी अब बता किधर जाएं? ज़हर बाजार में मिला नहीं!

हो सकता है ज़िंदगी के आनंद, सुख सुवधा, अमीरी और विकास के दावे करने वाले अपनी जगह सही हों शायद लेकिन नूर साहिब तो ुकि बात करते हैं जो बहु संख्या में हैं और ज़िंदगी में दुःख, सर्द और गम का विष पी रहे हैं। नूर साहिब उस ज़िंदगी बात करते हुए कहते हैं:

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं! और क्या जुर्म है, पता ही 

तो आजकल के दौर की ज़िंदगी की सभी मुश्किलों की  तरफ बहुत ही सलीके से इशारा कर जाते हैं। जीना भी कठिन है और मरना भी  गया--कितनी गहन मजबूरी है! उनकी शायरी पढ़ते जा सुनते हुए इस बात का अहसास बहुत बार होता है। 

उनका इस दुनिया में जन्म 29 अगस्त 1954 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की बांसगाँव तहसील (अब खजनी) अन्तर्गत ग्राम कुण्डाभरथ में  हुआ। लगता है इस जन्म से पहले वह निश्चित ही किसी और दुनिया में भी रहे होंगे। उनकी शैरी पढ़ते हुए अहसास होता है कि उनकी शिक्षा की औपचारिकता भी पूरी शिद्दत से। कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम. ए. किया। सन 1968-69 से लेखन की शुरुआत हुई। पहली कहानी सन 1071में प्रकाशित हुई और उनका नाम कहानीकारों में भी उभर कर सामने आया। तबसे सैकड़ों रचनाएँ हिन्दुस्तान के प्रमुख समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशितहोती रहीं। यूट्यूब पर उनके मुशायरे भी मिल जाएंगे। अनेक प्रकार की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के सदस्य और इमारात में हिन्दी के विकास में संलग्न रहे। संप्रति संयुक्त अरब इमारात के अबूधाबी नगर में अध्यापन के व्यवसाय में हैं। उनकी रचनाएं आज भी बहुत से लोगों के दिलों में हैं। उनकी शायरी सीधा दिल में उतरती है। इसके साथ ही ज़िंदगी के रूबरू भी करवाती है। 

उनकी प्रकशित कृतियों में कुछ नाम आज भी विशेष हैं:

कहानी संग्रहों में हैं : दो औरतें, पूरी हक़ीकत पूरा फ़साना, नातूर।

एकांकी नाटक में हैं: यह बहस जारी रहेगी, एक दिन ऐसा होगा, गांधी के देश में

नाटक की दुनिया में है: संगठन के टुकड़े

कविता संग्रह में: मेरे मुक्तक : मेरे गीत, मेरे गीत तुम्हारे हैं, मेरी लम्बी कविताएँ,

उपन्यास: रेखा उर्फ नौलखिया, पथराई आँखों वाला यात्री, पारदर्शियाँ।

यात्रा वृतांत: सागर के इस पार से उस पार से।

गौरतलब है कि "दो औरतें" कहानी का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रॉमा दिल्ली द्वारा श्री देवेंन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में सन 1996 में जो मंचन हुआ वह बेहद लोकप्रिय हुआ। अखबार और रेडियो की दुनिया से संबद्ध रहने के बाद सत्रह वर्षों से भी अधिक समय तक अध्यापन से भी जुड़े रहे। इसे इस रूप में भी बेहद पसंद किया गया। 

कृष्ण बिहारी नूर साहिब के बहुत सी शायरी विभिन्न वेबसाईट पर भी देखी जा सकती है। उनके लिए अलग से भी एक समर्पित वेवसाईट बनाने के प्रयास चले थे लेकिन इनके बारे में ज़्यादा पता नहीं चल सका। आखिर में एक बात और कि वह आखिरी सांस तक शायरी और मुशायरे के लिए समर्पित रहे। ऐसे ही हुआ करते हैं कलम के सिपाही। 

नूर साहिब पर यह पुरानी पोस्ट है नई पोस्ट आप पढ़ सकते हैं हैं बस यहाँ क्लिक करके 


निरंतर सामाजिक चेतना और जनहित ब्लॉग मीडिया में योगदान दें। हर दिन, हर हफ्ते, हर महीने या कभी-कभी इस शुभ कार्य के लिए आप जो भी राशि खर्च कर सकते हैं, उसे अवश्य ही खर्च करना चाहिए। आप इसे नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके आसानी से कर सकते हैं।

Saturday, 4 September 2021

मुनादी//धर्मवीर भारती की यादगारी ऐतिहासिक रचना

 इस कविता ने उस वक्त का सच सामने रखा था 


खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का

हुकुम शहर कोतवाल का

हर खासो-आम को आगह किया जाता है

कि खबरदार रहें

और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से

कुंडी चढा़कर बन्द कर लें

गिरा लें खिड़कियों के परदे

और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें

क्योंकि

एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में

सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है


शहर का हर बशर वाकिफ है

कि पच्चीस साल से मुजिर है यह

कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए

कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए

कि मार खाते भले आदमी को

और असमत लुटती औरत को

और भूख से पेट दबाये ढाँचे को

और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को

बचाने की बेअदबी की जाये


जीप अगर बाश्शा की है तो

उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?

आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !

बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले

अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने

एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ

भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं

और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर

तुम पर छाँह किये रहते हैं

और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी

मोटर वालों की ओर लपकती हैं

कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;

तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर

भला और क्या हासिल होने वाला है ?


आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से

जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप

बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए

रात-रात जागते हैं;

और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए

मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक

छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…

तोड़ दिये जाएँगे पैर

और फोड़ दी जाएँगी आँखें

अगर तुमने अपने पाँव चल कर

महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर

अन्दर झाँकने की कोशिश की


क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी

जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे

काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?

वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ

गहराइयों में गाड़ दी है

कि आने वाली नस्लें उसे देखें और

हमारी जवाँमर्दी की दाद दें


अब पूछो कहाँ है वह सच जो

इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?

हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं

और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें

ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में

इस बुड्ढे की बकवास दब जाए


नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते

फेंक दी है खड़िया और स्लेट

इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह

फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं

और जिसका बच्चा परसों मारा गया

वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई

सड़क पर निकल आयी है।


ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है

पर जहाँ हो वहीं रहो

यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि

तुम फासले तय करो और

मंजिल तक पहुँचो


इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे

नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी

बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी

ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा

सब अपनी-अपनी जगह ठप

क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है

और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है

वहीं ठप कर दिया जाए


बेताब मत हो

तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है

बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से

तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए

बाश्शा के खास हुक्म से

उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा

दर्शन करो !

वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी

बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी

ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा

नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा

और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा

लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में

और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो

ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से

बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

                              --धर्मवीर भारती  

देश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण जनता के परिनिधि बन कर ु भरे थे सत्ता के खिलाफ। उस दौर की याद दिलाती यह कविता "मुनादी" आज भी बहुत कुछ कह रही है। हालात और भी नाज़ुक होते जा रहे हैं। ऐसे में यह रचना कालजयी साबित हो रही है। देश भर में एक हवा पैदा हो गई थी लोकनायक जे पी के पीछे पूरी जनता चल पड़ी थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण जब घर से निकले तो फिर एक बविषाल काफिला बन गया। वह लुधियाना भी आए थे। उनकी रैलियों की कवरेज अंग्रेजी मीडिया ने बहुत नदे पैमाने पर की थी।  उनके खिलाफ सत्ता के रुख को डा. धर्मवीर भारती की यह प्रसिद्ध काव्य रचना किसी दस्तावेज़ी की तरह संभालती हुई लगातार आगे लेजा रही है। मुनादी कहते ही डी.धर्मवीर भर्ती यद् आते हैं पर साथ ही याद आते हैं जयप्रकाश नारायण और उनका आंदोलन। जे पी साहिब के उस नाज़ुक दौर से चलती हुई यह बात बहुत कुछ याद दिलाती है और किसान आंदोलन तक इस काव्य रचना को एक बार फिर प्रासंगिक क्र देती है। इस पर विस्तृत चर्चा जल्द ही की जाएगी किसी अलग पोस्ट में फ़िलहाल इतना ही कि भारती जी की यह रचना आज भी अमर है। आज भी प्रासंगिक है। यह आज भी बहुत कुछ कह रही है। -सम्पादक:साहित्य स्क्रीन 

Sunday, 15 August 2021

बहुत कुछ कहती है पुस्तक स्वांग

 14th June 2021 at 3:33 PM

स्वाँग में नकल के ज़रिए सब असल हल्कीक्त बताने का प्रयास 

लुधियाना: 14 जून 2021: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::

वास्तव में जो जो भी नज़रआता है वो होता नहीं है और जो होता है वो नज़र नहीं आता। यही बन गया है आज का जीवन। यही है जीवन की हकीकत। यही है विकसित युग का सच। यही है तरक्की का अंजाम। 

स्वाँग कभी एक बेहद लोकप्रिय लोकनाटय विधा रही है बुंदेलखंड की। नाटक, नौटंकी, रामलीला से थोड़ी इतर। न मंच, न परदा, न ही कोई विशेष वेशभूषा। बस अभिनय। इस तरह के ज़ोरदार प्रयास पंजाब में भी हुए। जन नाटय से जुड़े भाई मन्ना सिंह उर्फ़ सरदार गुरशरण सिंह इस मामले में निपुण थे। राजनीती, समाज और धर्म के क्षेत्र में जो जो हो रहा है इन सभी की जितनी हकीकतें उन्होंने अपने सादगी भरे नुक्कड़ नाटकों के ज़रिए लोगों के सामने रखीं वह आज भी एक कमाल हैं। 

स्वांग नामक पुस्तक इस सब की याद भी दिलाती है। स्वाँग का मज़ा इसके असल जैसा लगने में ही तो है। एकदम असली, जो कि वहाँ सब नकली होता है: नकली राजा, नकली सिपाही, नकली कोड़े, नकली जेल, नकली साधु, काठ की तलवार, नकली दुश्मन और नकली लड़ाइयाँ। नकली नायक, नकली खलनायक। वही नायक, वही खलनायक। सब जानते हैं कि अभिनय है, नकली है सब, नाटक है यह; पर जब इसका मंचन होता है उस पल वह कितना जीवंत प्रतीत होता है। लगता है एकदम असल है सब।

लोकनाटय तो ख़ैर बहुत से स्थानों पर समय के साथ साथ डूब गए। अब बुंदेलखंड के गाँवों में स्वाँग नहीं खेला जाता। परन्तु हुआ यह है कि अब मानो पूरा समाज ही स्वाँग खेलने में व्यस्त हो गया है। सामाजिक, राजनीतिक, न्याय और कानून, इनकी व्यवस्था का सारा तंत्र ही एक विराट स्वाँग में बदल गया है। जहाँ देखो आपको इसका रूप नज़र आ ही जाएगा। यह न केवल बुंदेलखंड के बल्कि हिंदुस्तान के समूचे तंत्र के एक विराट स्वाँग में तब्दील हो जाने की कहानी है। इस तरह यह किताब एक इतिहास भी है और एक विशेष रिपोर्ट भी है। समाज को ही बताया जा रहा है समाज की असलियत का हाल।  

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Sunday, 27 June 2021

"नारीवादी निगाह से" गंभीर मुद्दे हैं निवेदिता मेनन की इस पुस्तक में

 14th June 2021 at 3:33 PM

 बहुत सी समस्याओं को उठाती है निवेदिता मेनन की यह पुस्तक 


नई दिल्ली//लुधियाना//:27 जून 2021: (साहित्य स्क्रीन डेस्क):: 

विवाह होता है तो इस को बहुत ही शगुन भरा घटनाक्रम माना जाता है। लेकिन इसे कभी भी नारीवादी नज़रिये से देखा ही नहीं गया। एक लड़की को उसके घर परिवार से अलग कर के कोई बेगाना घर अपनाने की रस्म है विवाह जिसमें लड़की को लाने वाले ढोल बजाते हैं जैसे अपना जय घोष कर रहे हों। यहीं से शुरू हो जाती है नारी की क़ुरबानी। कई बार तो उसका नाम भी बदल दिया जाता है। लड़की के साथ साथ खुले या छुपे रूप में दहेज की मांग भी की जाती है। पितृसत्ता के दौर में इस सारे घटनाक्रम को नाम दिया जाता है कि लड़की का घर बसा दिया। नारी के जीवन में, उसकी मानसिकता में कितनी उलझनें पैदा होती हैं यह वही जानती है। समाज तो बस दूर से तमाशा ही देखता है। आम तौर पर इस सारे दर्द को नज़र अंदाज़ भी कर दिया जाता है। निवेदिता मेनन ने "सीइंग लाईक ए फेमिनिस्ट" अंग्रेजी में इन्हीं बहुत से सवालों को ले कर लिखी थी। अंग्रेजी की अपनी पहुँच है लेकिन बहुत से लोग हैं जो हिंदी को पसंद करते हैं। अच्छा हो इसका पंजाबी अनुवाद भी प्रकाशित हो। हिंदी में जह छपा है "नारीवादी निगाह से" और बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है।  

इस किताब की बुनियादी दलील नारीवाद को पितृसत्ता पर अन्तिम विजय का जयघोष सिद्ध नहीं करती। इसके बजाय वह समाज के एक क्रमिक लेकिन निर्णायक रूपान्तरण पर ज़ोर देती है ताकि प्रदत्त अस्मिता के पुरातन चिह्नों की प्रासंगिकता हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए। नारीवादी निगाह से देखने का आशय है मुख्यधारा तथा नारीवाद, दोनों की पेचीदगियों को लक्षित करना। यहाँ जैविक शरीर की निर्मिति, जाति-आधारित राजनीति द्वारा मुख्यधारा के नारीवाद की आलोचना, समान नागरिक संहिता, यौनिकता और यौनेच्छा, घरेलू श्रम के नारीवादीकरण तथा पितृसत्ता की छाया में पुरुषत्व के निर्माण जैसे मुद्दों की पड़ताल की गई है। एक तरह से यह किताब भारत की नारीवादी राजनीति में लम्बे समय से चली आ रही इस समझ को दोबारा केन्द्र में लाने का जतन करती है कि नारीवाद का सरोकार केवल ‘महिलाओं’ से नहीं है। इसके उलट, यह किताब बताती है कि नारीवादी राजनीति में कई प्रकार की सत्ता-संरचनाएँ सक्रिय हैं जो इस राजनीति का मुहावरा एक दूसरे से अलग-अलग बिन्दुओं पर अन्तःक्रिया करते हुए गढ़ती हैं।

पेपरबैक संस्करण 240 पेज का है और कीमत है 275/- रुपए।  जिल्द का डीलक्स एडिशन है 299/-रुपए का।इसका हिंदी अनुवाद बहुत सुंदर है और इस ज़िम्मेदारी को निभाया है नरेश गोस्वामी ने। 

पुस्तक चर्चा के लिए आप भी पुस्तकें, पुस्तक रिलीज़ निमंत्रण, आयोजन की खबरें, आयोजन की रिपोर्टें और तस्वीरें भेज सकते हैं। कवरेज टीम को बुलाने के लिए अग्रिम सूचना आवश्यक है। इस मकसद के लिए फोन और ईमेल दोनों से सम्पर्क कर सकते हैं। 

ईमेल है: medialink32@gmail.com और WhatsApp है:+919915322407 

Friday, 29 May 2020

हम देखेंगे//फैज़ अहमद फैज़ साहिब

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिस का वादा है जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ रूई की तरह उड़ जाएँगे हम महकूमों के पाँव-तले जब धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे बस नाम रहेगा अल्लाह का जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी जो मंज़र भी है नाज़िर भी उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो (--फैज़ अहमद फैज़ साहिब)

Friday, 21 February 2020

निरंतर सक्रिय है लुधियाना का प्रीत साहित्य सदन

साहित्य को अभियान बनाने में जुटा साहित्य प्रेमियों का विशेष ग्रुप 
लुधियाना: 21 फरवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
वाटसअप ग्रुप प्रीत साहित्य सदन 
साहित्य में चलती सियासत से कोसों दूर रहते हुए शुद्ध साहित्य पर अपना ध्यान केंद्रित करने वालों में से एक हैं  लुधियाना के जनाब मनोज कुमार "प्रीत"। यूं तो अक्सर साहित्यिक आयोजनों में भी दिख जाते हैं लेकिन ज़्यादातर उनका ध्यान केंद्रित रहता है "प्रीत साहित्य सदन" पर। कहने को तो यह एक वाटसअप ग्रुप ही है लेकिन वास्तव में यह एक अभियान है-साहित्य समर्पित अभियान। देश और दुनिया के अलग अलग कोनों में रहने वाले साहित्यकारों को एक  पिरोने का अभियान भी। यदि कोई सदस्य जाने अनजाने अपने सियासी प्रचार की  उसे तकरीबन तकरीबन सभी एडमिन बहुत ही प्यार से समझा देते हैं की ऐसा करने की इस ग्रुप में इज़ाज़त नहीं है। ग्रुप में हिंदी साहित्य की चर्चा भी होती है और पंजाबी साहित्य की भी। इसी ग्रुप के ज़रिये हर बार सदन की साहित्यिक बैठक के आयोजन की सूचना भी सदस्यों को दी जाती है। आम तौर पर आयोजन का स्थान भी हर बार वही होता है लुधियाना के समराला चौंक में स्थित सदन का कार्यालय। इन्हीं बैठकों में साहित्य प्रेमी मिल कर बैठते हैं। शायरी का दौर चलता है। साहित्य की चर्चा होती है और कई बार किसी न किसी पुस्तक का विमोचन भी सुनिश्चित।  प्रपत्र भी  और उन पर चर्चा भी होती है। इसी ग्रुप में देश के अन्य स्थानों पर होने वाले आयोजनों की सूचना भी दी जाती है और अन्य विवरण भी। साथ ही शायरी का प्रकाशन भी होता है और साहित्य रस से भरी नोक झोंक भी चलती है। कुल मिला कर यह ऐसा ग्रुप है जो आपको साहित्य से भी जोड़े रखता है  साहित्यकारों से भी। 
इसी ग्रुप में से जनाब सुभाष गुप्ता शफी़क़ साहिब की दो लघु काव्य रचनाएं:
अच्छा हो सकता नहीं उस बस्ती का हाल
बेसन हो सस्ता जहां महंगी चने की दाल
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बोना और फिर सींचना हम को लगे फजूल
ले आये बाजार से हम कागज के फूल
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Tuesday, 7 January 2020

जे एन यू के जुगनू//रजनी शर्मा

जेएनयू के छात्रों पर हुए हमले ने साहित्य पर भी प्रभाव डाला 
हमलावरों के हमले में घायल छात्र नेता आईशी घोष 
साहित्य क्षेत्र: 7 जनवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
कलमकार संवेदनशील होते हैं। इसीलिए उन्हें प्राकृति भी अपने सभी रहस्य बहुत आसानी से बता देती है। हर घटना उनके दिल और दिमाग पर असर करती है। जेएनयू में छात्रों पर हुए हमले ने भी उन्हें आंदोलित किया है।एक शायरा रजनी शर्मा ने इस अमानवीय घटना पर एक काव्य रचना लिखी है जिसे हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। --रेक्टर कथूरिया 
जे एन यू के जुगनू//रजनी शर्मा
अचानक नकाबपोश
अंधेरे मे
पहुंच जाते हैं
पकड़ कर डंडे
जे एन यू  के जुगनुओं
को पकड़ने
और गेट अपने आप
खुल जाता है
ताकि अंधेरे में
 उन्हें मसला जाए
सिर फोड़
खून बहाया जाए,
जश्न मनाया जाए,
पर वो क्यों
भूल गए
झूठ की धुन्ध
ज्यादा देर नही टिकती,
सूरज निकलेगा,
फिर उड़ेंगे
ज़ख्मी पर
फिर चमकेंगे
यह जुगनू,
करेंगे अंधेरे का मुँह
और काला।
            ----!!रजनी शर्मा!!

Friday, 3 January 2020

आज के विकास का असली सच बताती प्रो. गुरभजन गिल की काव्य रचना

विज्ञान से भी अधिक सच बताने का प्रयास कर रहा है साहित्य 
साहित्य क्षेत्र: 7 जनवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो):: 
आज के युग का विकास कितना निरथर्क और खोखला सा लगने लगा है इसकी झलक अब आज के साहित्य में भी आने लगी है। डार्विन झूठ बोलता है-एक ऐसी ही रचना है। न कोई विज्ञान, न कोई शोध कार्य लेकिन बात सीधा दिल में उतरती है और इसके लिए कोई प्रमाण भी नहीं मांगती।आप भी पढ़िये और बताईए कि आपको  कैसी लगी यह रचना? आपके विचारों की इंतजार रहेगी ही। बहुत ही गहरी बात कह रही इस काव्य रचना का बहुत ही सशक्त अनुवाद किया है प्रदीप सिंह ने। --रेक्टर कथूरिया 
डार्विन झूठ बोलता है//प्रो. गुरभजन सिंह गिल 
हम विकसित बंदर से नहीं
भेड़ से हुए हैं
भेड़ थे
भेड़ हैं
और भेड़ रहेंगे
जब तक हमें हमारी ऊन की
कीमत पता नहीं चलती।
हमें चराने वाला ही हमें काटता है।
बंदर तो बाज़ार में खरीद-फरोख्त करता
कारोबारी है।
बिना कुछ खर्च किए
मुनाफे का अधिकारी है।
हम दुश्मन नहीं पहचानते
हमारी सोच मरी है।
डार्विन से कहो!
अपने विकासवादी सिद्धांत की
फिर समीक्षा करे!
कि वक़्त बदल गया है।
            -गुरभजन गिल
अनुवाद- प्रदीप सिंह

Wednesday, 1 January 2020

डा. राजेन्द्र टोकी को मिला उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान का "सौहार्द सम्मान"

पंजाब प्रदेश की खन्ना तहसील में रहते हैं राजेंद्र टोकी 
खन्ना//लुधियाना: 31 दिसंबर 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा  पंजाब प्रदेश की खन्ना तहसील में रहने वाले सतत् स्वाध्यायशील एवं यशस्वी साहित्यकार डा. राजेन्द्र टोकी को  2 लाख रु. राशि वाला *सौहार्द सम्मान* प्रदान किया गया है।  
अपनी भलमनसाहत के लिए विख्यात डॉ. राजेन्द्र टोकी की गणना भारतीय जीवन-मूल्यों के संवाहक और लेखन व शिक्षा के प्रति आस्थावान व्यक्तित्वों में होती है। रचना, आलोचना, अनुवाद, अनुसन्धान, सम्पादन आदि उनके कृतित्त्व के कई पहलू हैं| कविता, ग़ज़ल, कहानी, निबन्ध जैसी विधाओं में रचनात्मक लेखन के 
अतिरिक्त उर्दू व पंजाबी से हिन्दी अनुवाद, सम्पादन और आलोचनाकर्म में तल्लीन रहते हुए उन्होंने लगभग 
42 पुस्तकों के माध्यम से साहित्य-भण्डार में श्रीवृद्धि की है। टोकी जी द्वारा  "ओउम् जय जगदीश हरे"  आरती के रचयिता पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी पर गम्भीर अनुसन्धानपरक कार्य किया है| लुधियाना शहर के सीमान्त पर बसे 'फिल्लौर' कस्बे में रहने वाले श्रद्धाराम फिल्लौरी की हिन्दी, संस्कृत, उर्दू और पंजाबी की अनुपलब्ध रचनाओं के अन्वेषण के पश्चात् किया गया यह कार्य निश्चित ही श्रमसाध्य एवं सर्वोत्कृष्ट कार्य है। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा राजेन्द्र टोकी जी को वर्ष-2018 के लिए "सौहार्द सम्मान" दिए जाने से ईमानदार लेखन की प्रति आस्था और उत्साह जगा है। निश्चित ही पुरस्कार की गरिमा भी बढ़ी है। इसके लिए 'उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ' की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की जानी चाहिए। राजेन्द्र टोकी जी को "सौहार्द सम्मान" मिलने पर साहित्य स्क्रीन परिवार की तरफ से भी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। 

Saturday, 30 March 2019

आधी आबादी के दर्द की एक झलक दिखाती रचना

एक पत्नी का रोजनामचा
बेवक़ूफ़ 
वो
रोज़ाना की तरह
आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी.
किचिन में आई
और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया.
फिर
बच्चों को जगाया
ताकि वो स्कूल के लिए तैयार हो सकें.
फिर
उसने किचिन में
जाकर चाय निकाली
अपने सास ससुर को देकर आयी,
फिर
उसने बच्चों का
नाश्ता तैयार किया
और बीच-बीच में बच्चों को ड्रेस पहनाई,
और
फिर बच्चों को
नाश्ता कराकर उनके
स्कूल का लंच तैयार करने लगी.
इस बीच
बच्चों के स्कूल का
रिक्शा आ गया..
वो
बच्चों को
रिक्शा तक छोड़ कर आई.
वापस आकर
मेज़ से बर्तन इकठ्ठा किये.
इसी बीच
पतिदेव की आवाज़ आई कि मेरे कपङे निकाल दो.

उनको
ऑफिस जाने लिए
कपड़े निकाल कर दिए,
और
वापस आकर
फिर पति के लिए
नाश्ता तैयार करने लगी.
अभी
पति के लिए
उनकी पसन्द का
नाश्ता अण्डा और पराठे तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था,
कि
छोटी ननद आई
और ये कहकर कि भाभी मुझे आज कॉलेज जल्दी जाना है,
नाश्ता उठा कर ले गयी.
वो
फिर एक
हल्की सी मुस्कराहट के साथ वापस किचिन में आई.
इतने में
देवर की आवाज़ आई
भाभी नाश्ते तैयार हो गया क्या..?
"जी भाई अभी लायी..!"
ये कहकर
उसने फिर से
अपने पति और देवर के लिए अॉमलेट और पराठे तैयार करने शुरू किये.
"लीजिये नाश्ता तैयार है..!"
पति और देवर ने
नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने-अपने ऑफिस के लिए निकल चले.
उसने
मेज़ पर से
खाली बर्तन समेटे
और सास-ससुर के लिए
उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी..
दोनों को
नाश्ता कराने के बाद
फिर बर्तन इकट्ठे किये
और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी..
इसबीच
सफाई वाली भी आ गयी.
उसने
बर्तन का काम
सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगैरह इकट्ठा करने पहुँच गयी.
और फिर
सफाई वाली के साथ
मिलकर सफाई में जुट गयी.
अब तक 11 बज चुके थे.
अभी
वो पूरी तरह
काम समेट भी ना पायी थी कि कॉलबेल बजी.

दरवाज़ा खोला
तो सामने बड़ी ननद
और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे.
उसने
ख़ुशी-ख़ुशी
सभी को आदर के साथ घर में बुलाया,
और
उनसे बातों में
उनके आने की ख़ुशी का इज़हार करती रही.
ननद की
फ़रमाइश के मुताबिक़
नाश्ता तैयार करने के बाद
अभी वो ननद के पास बैठी ही थी...
कि
सास की आवाज़ आई
"बहू खाने का क्या प्रोग्राम है..?"
उसने घडी पर
नज़र डाली तो 12 बज रहे थे.

उसकी
फ़िक्र बढ़ गयी
वो जल्दी से फ्रिज़ की तरफ लपकी
और
सब्ज़ी निकाली 
फिर से दोपहर के
खाने की तैयारी में जुट गयी.
खाना
बनाते-बनाते
अब दोपहर का एक बज चुका था.
बच्चे
स्कूल से आने वाले थे.
लो बच्चे आ गये...
उसने
जल्दी-जल्दी
बच्चों की ड्रेस उतारी
और उनका मुँह-हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया.
इसी बीच
छोटी ननद भी
कॉलेज से आ गयी
और देवर भी आ चुके थे.
उसने
सभी के लिए
मेज़ पर खाना लगाया
और खुद रोटी बनाने में लग गयी.
खाना खाकर
सब लोग फ्री हुए
तो उसने मेज़ से फिर
बर्तन जमा करने शुरू कर दिये.
इस वक़्त तीन बज रहे थे.
अब
उसको
खुद को भी
भूख का एहसास होने लगा था.
उसने
हॉट-पॉट देखा
तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी.
उसने
फिर से
किचिन की ओर रुख किया .
तभी
पतिदेव घर में
दाखिल होते हुये बोले कि
आज
देर हो गयी
भूख बहुत लगी है
जल्दी से खाना लगा दो.
उसने
जल्दी-जल्दी
पति के लिए खाना बनाया
और
मेज़ पर
खाना लगा कर
पति को किचिन से गर्मागर्म रोटियाँ बनाकर
ला-ला कर देने लगी.
अब तक चार बज चुके थे..
अभी वो
खाना खिला ही रही थी
कि पतिदेव ने कहा कि आ जाओ तुम भी खालो.
उसने
हैरत से
पति की तरफ देखा
तो उसे ख्याल आया कि
आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं.
इस ख्याल के
आते ही वो पति के
साथ खाना खाने बैठ गयी.
अभी
पहला निवाला
उसने मुँह में डाला ही था की आँख से आँसू निकल आये.
पतिदेव ने
उसके आँसू देखे
तो फ़ौरन पूछा कि
तुम क्यों रो रही हो...?
वो खामोश रही
और सोचने लगी कि
इन्हें
कैसे बताऊँ कि
ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता है
आकांक्षा यादव के ब्लॉग से साभार 
और लोग
इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं.
पति के
बार बार पूछने पर
उसने सिर्फ इतना कहा
कि
कुछ नहीं
बस ऐसे ही आँसू आ गये.
पति
मुस्कुराये और बोले
तुम
औरतें भी
बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो.
बिना वजह
रोना शुरू करदेती हो.
........... 
क्या वो 
वाकई बेवक़ूफ़ होती हैं..?

ज़रा सोचिये..
उन्हें 
ज्यादा कुछ नहीं
सहानुभूति और स्नेह 
के बस दो मीठे बोल चाहिये.

अपनी पत्नी को सम्मान दीजिए.... 

(यह सन्देश रूपी रचना वाट्सएप पर मिली।  किसने लिखा, इसका जिक्र नहीं ... पर जिसने भी लिखा दिल्लगी से लिखा.....साधुवाद ।  अच्छा लगा, अत: आप सभी के साथ शेयर कर रही हूँ)

साभार -आकांक्षा यादव @ शब्द-शिखर 
Akanksha Yadav @ http://shabdshikhar.blogspot.in/

Saturday, 29 December 2018

लुधियाना में "नवरंग" की तरफ से हुआ मुशायरे का आयोजन

भिलाई से डा. शुचि "भवि" और लखनऊ से डा. हरि प्रसाद भी पहुंचे 
लुधियाना: 29 दिसंबर 2018: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: 
जब वर्ष के अंत में 25 दिसंबर का अंतर्राष्ट्रीय त्यौहार और तुलसी पूजन का राष्ट्रिय त्यौहार गुज़र जाता है तो यूं  लगने लगता है जैसे वर्ष के साथ साथ त्योहारी सीज़न समाप्त हो गया हो। सेलिब्रेशन के दिन अतीत की बात बन गए हों। दिल्ली के एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार से लौट कर थकावट का अहसास भी कुछ ज़्यादा ही होने लगा था शायद यह घर के राहत भरे माहौल का असर भी था। इसी बीच इंडियन पीपुल्ज़ थिएटर एसोसिएशन अर्थात इप्टा से जुड़े सक्रिय कलाकार और मंच निदेशक प्रदीप शर्मा जी ने कहा की आज शाम को तो वाईली स्कूल में एक मुशायरा है। बस इतना सुनते ही साड़ी थकावट रफ़ूचक्र  हो गयी। ऐसे लगने लगा जैसे त्योहारी सीज़न फिर लौट आया हो। और हम कुछ मिण्टस की देरी से मुशायरे में पहुंच गए। 
 वास्तव में इस आयोजन में केवल मुशायरा ही नहीं कुछ ख़ास बुद्धिजीवियों से भेंट का एक सुअवसर भी था। इस आयोजन में बेहद आकर्षक व्यक्तित्व  प्रभाव की शायरा शुचि "भवि" भी मौजूद  थीं जो भिलाई (छत्तीसगढ़) से आईं हुईं थी। काव्य के क्षेत्र में उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  
      उनके साथ ही मुशायरे में मौजूद थे डा. हरि प्रसाद फ़ैज़ाबादी जो लखनऊ से आए हुए थे। उनकी एक खासियत यह भी की उन्होंने जानमाने शायर जनाब राहत इंदौरी साहिब पर पीएचडी की है। उनका इस मुशायरे में होना सभी शायरों के लिए एक गौरव की बात थी। राहत इंदौरी साहिब इस युग के लोकप्रिय जन-शायर के रूप में जाने जाते हैं। उनका सच बोलने का अंदाज़ उनकी हिम्मत को भी दर्शाता है। आजकल सच बोलना और भी मुश्किल हो गया है। 
इस मुशायरे में बहुत लम्बी साहित्य साधना करने वाली डा. गुरुचरण कौर कोचर, हिंदी, उर्दू हुए पंजाबी में लिखने वाली लोकप्रिय शायरा जसप्रीत कौर फलक, सादगी पर पहरा देने वाली शायरा छाया शर्मा, बहुत ही सलीके से कलम के दुश्मनों पर चोट करने वाले शायर जनाब आशु गर्ग साहिब, एकता पूजा शर्मा और बहुत से  और भी जानमाने शायर शायर मौजूद थे जिनके लिए आज के इस व्यापारिक और कारोबारी युग में भी कलम की साधना सर्वोप्रिय है। 
लुधियाना के माहौल में शायरी की शमा जलाये रखा, इसके लिए वक्त निकालना, सारे प्रबंध और आयोजन की दिक्कतों के होते हुए सफल इवेंट---आसान नहीं था लेकिन सभी प्रबन्धक बधाई के हकदार हैं। जनाब सागर सियलकोटि साहिब का मंच संचालन भी कमाल का था। जज़्बातों की बाढ़ में समय और इवेंट के आयोजन की कश्ती को संभाले रखना आसान नहीं होता। उन्होंने समय का बहुत ध्यान रखा। शेख शाहरुख़ राजा ने भी सक्रिय योगदान दिया। लुधियाना की सक्रिय शायरा नीलू बग्गा लुधयानवी ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुगध किया। इस सरे आयोजन की सफलता में कुछ नाम ऐसे भी हैं जो पर्दे के पीछे रहते हैं। अक्सर वे सामने नहीं आते -उन्हीं में से एक नाम डा. बेनु सतीश कांत का। रचनत्मक कार्यों में हर समय उनका पूरा परिवार सक्रिय रहता है। 
शायरों का कलाम आप वीडियो में सुन भी सकते हैं--और साथ ही उनका अंदाज़ भी देख सकते हैं। कोशिश होगी जल्द ही आपके सामने नए आयोजन की रिपोर्ट भी लाई जाये। 

Wednesday, 11 April 2018

दिल को छूने वाली सादगी भरी शायरी करते हैं रौनक साहिब

प्रगतिशील विचारधारा से गहरा और भावुक सम्बन्ध
सैकड़ों पुल बने फ़ासले भी मिटे, 
आदमी आदमी से जुदा ही रहा। 
यह किसका शेयर है--मुझे नहीं मालूम था।
मुझे लगा मनोज जी ने रचा है।  लेकिन यह एक गलतफ़हमी थी। थोड़ी खोज की तो जवाब मिल गया। 
यह शेयर रौनक़ नईम साहिब का है। रौनक़ नईम साहिब प्रगतिशील आंदोलन के लिए निरंतर सक्रिय रहे हैं।
प्रगतिशील आन्दोलन से सम्बद्ध विशिष्ट महत्व के शायरों में से हैं रौनक़ नईम साहिब। उन्होंने न सिर्फ़ प्रगतिवादी विचारधारा को आम करने वाली शायरी की बल्कि आन्दोलन के एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में अवाम के बीच काम भी किया। उनकी शायरी में मुश्किल से शब्द नहीं होते। भारी भरकम शब्द भी नहीं होते। दिल को छूने वाली सादगी भरी शायरी करते हैं रौनक साहिब।
पृष्ठभूमि देखें तो तार बांग्ला से भी जुड़ती है कर उर्दू से भी। रौनक़ नईम की पैदाइश 1933 में सिवड़ी पश्चिम बंगाल में हुई। रौनक़ के पिता बांगला भाषा में शायरी करते थे। चचा मुहम्मद इकराम अशरफ़ी और मौसा अब्बास अली ख़ाँ उर्दू के शायर थे। रौनक़ ने आरम्भ में अपने मौसा से ही कलाम का संशोधन कराया। रौनक़ ने जिस वक़्त शायरी शुरू की प्रगतिशील आन्दोलन अपने शिखर पर था। अतः उन्होंने इसकी विचारधारा से प्रभावित हो कर पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध और एक आधुनिक समाज के हक में नज़्में लिखीं। उनकी नज़्में और गज़लें आन्दोलन की मुखपत्रिका ‘शाहराह’ और सज्जाद ज़हीर के साप्ताहिक ‘अवामी दौर’ में नियमित रूप से प्रकाशित होती थीं।
रौनक़ नईम के कई काव्य संग्रह प्रकाशित हुए, कुछ के नाम ये हैं— ‘दायरा दर दायरा’, ‘पानी बहता जाए’, ‘समन्दर बोलता है’, ‘उदास जंगल’। प्रसिद्ध प्रगतिवादी शायर और आन्दोलन के सक्रिय सदस्य होने के कारण उनकी शायरी में भी यह सब स्पष्ट झलकता था। उम्मीद है आपको उनकी शायरी आम जनता के दुःख सुख की बातें सुनते हुए संघर्षकि दुनिया में ले जाएगी। 

Monday, 26 February 2018

🌅 सुबह-सवेरे 🌅 अगर तुम युवा हो//शशिप्रकाश

तुम हो वीर शहीदों के जीवन के वे दिन//जिन्हें वे जी न सके
जब तुम्हें होना है
हमारे इस ऊर्जस्वी, सम्भावनासम्पन्न,
लेकिन अँधेरे, अभागे देश में
एक योद्धा शिल्पी की तरह
और रोशनी की एक चटाई बुननी है
और आग और पानी और फ़ूलों और पुरातन पत्थरों से
बच्चों का सपनाघर बनाना है,
तुम सुस्ता रहे हो
एक बूढ़े बरगद के नीचे
अपने सपनों के लिए एक गहरी कब्र खोदने के बाद।

तुम्हारे पिताओं को उनके बचपन में
नाज़िम हिकमत ने भरोसा दिलाया था
धूप के उजले दिन देखने का,
अपनी तेज़-रफ़्तार नावें
चमकीले-नीले-खुले समन्दर में दौड़ाने का।
और सचमुच हमने देखे कुछ उजले दिन
और तेज़-रफ़्तार नावें लेकर
समन्दर की सैर पर भी निकले।
लेकिन वे थोड़े से उजले दिन
बस एक बानगी थे,
एक झलक-मात्र थे,
भविष्य के उन दिनों की
जो अभी दूर थे और जिन्हें तुम्हें लाना है
और सौंपना है अपने बच्चों को।
हमारे देखे हुए उजले दिन
प्रतिक्रिया की काली आँधी में गुम हो गये दशकों पहले
और अब रात के दलदल में
पसरा है निचाट सन्नाटा,
बस जीवन के महावृत्तान्त के समापन की
कामना या घोषणा करती बौद्धिक तांत्रिकों की
आवाजें सुनाई दे रही हैं यहाँ-वहाँ
हम नहीं कहेंगे तुमसे
सूर्योदय और दूरस्थ सुखों और
सुनिश्चित विजय
और बसन्त के उत्तेजक चुम्बनों के बारे में
कुछ बेहद उम्मीद भरी बातें
हम तुम्हें भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं
बेचैन करना चाहते हैं।
हम तुम्हें किसी सोये हुए गाँव की
तंद्रिलता की याद नहीं,
बस नायकों की स्मृतियाँ
विचारों की विरासत
और दिल तोड़ देने वाली पराजय का
बोझ सौंपना चाहते हैं
ताकि तुम नये प्रयोगों का धीरज सँजो सको,
आने वाली लड़ाइयों के लिए
नये-नये व्यूह रच सको,
ताकि तुम जल्दबाज़ योद्धा की ग़लतियाँ न करो।

बेशक थकान और उदासी भरे दिन
आयेंगे अपनी पूरी ताक़त के साथ
तुम पर हल्ला बोलने और
थोड़ा जी लेने की चाहत भी
थोड़ा और, थोड़ा और जी लेने के लिए लुभायेगी,
लेकिन तब ज़रूर याद करना कि किस तरह
प्यार और संगीत को जलाते रहे
हथियारबन्द हत्यारों के गिरोह
और किस तरह भुखमरी और युद्धों और
पागलपन और आत्महत्याओं के बीच
नये-नये सिद्धान्त जनमते रहे
विवेक को दफ़नाते हुए
नयी-नयी सनक भरी विलासिताओं के साथ।
याद रखना फ़िलिस्तीन और इराक़ को
और लातिन अमेरिकी लोगों के
जीवन और जंगलों के महाविनाश को,
याद रखना सब कुछ राख कर देने वाली आग
और सबकुछ रातो रात बहा ले जाने वाली
बारिश को,
धरती में दबे खनिजों की शक्ति को,
गुमसुम उदास अपने देश के पहाड़ों के
निःश्वासों को,
ज़हर घोल दी गयी नदियों के रुदन को,
समन्दर किनारे की नमकीन उमस को
और प्रतीक्षारत प्यार को।

एक गीत अभी ख़त्म हुआ है,
रो-रोकर थक चुका बच्चा अभी सोया है,
विचारों को लगातार चलते रहना है
और अन्ततः लोगों के अन्तस्तल तक पहुँचकर
एक अनन्त कोलाहल रचना है
और तब तक,
तुम्हें स्वयं अनेकों विरूपताओं
और अधूरेपन के साथ
अपने हिस्से का जीवन जीना है
मानवीय चीज़ों की अर्थवत्ता की बहाली के लिए लड़ते हुए
और एक नया सौन्दर्यशास्त्र रचना है।

तुम हो प्यार और सौन्दर्य और नैसर्गिकता की
निष्कपट कामना,
तुम हो स्मृतियों और स्वप्नों का द्वंद्व,
तुम हो वीर शहीदों के जीवन के वे दिन
जिन्हें वे जी न सके।
इस अँधेरे, उमस भरे कारागृह में
तुम हो उजाले की खिड़कियाँ,
अगर तुम युवा हो!

व्हाटसप पर "मज़दूर बिगुल" ग्रुप  में 27 फ़रवरी 2018 को  सुबह 08:07 बजे पोस्ट की गयी रचना।