Showing posts with label Social Media. Show all posts
Showing posts with label Social Media. Show all posts

Friday, 12 August 2022

राहत इंदौरी साहिब की याद में खास प्रोग्राम 13 अगस्त को

इंदौर में होना है जश्न ए दास्तान नाम का यादगारी मुशायरा 


इंदौर
: 12 अगस्त 2022: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::

राहत इन्दौरी साहिब एक युग कवि थे। आम जनता के दिलों की बात बेहद सादगी से करने वाले महान शायर थे। शायरी के शब्द तो बहुत ख़ास होते ही थे लेकिन शायरी कहने का उनका अंदाज़ भी बेहद ख़ास था। एक एक शेयर को वह बहुत ही सलीके से कहते। एक नहीं कई कई अंदाज़ में कहते। इतने ज्यादाबहुत से अलग अलग अंदाज़ कि जिसे शायरी की पूरी समझ न भी आती हो उसे भी उनके अंदाज़ से उनका शेयर समझ आता।  न सिर्फ समझ आता बल्कि गहराई से दिल और दिमाग में उत्तर जाता। ऐसे थे हमारे राहत इंदौरी साहिब।  उनकी समृति में एक विशेष आयोजन हो रहा है। 

राहत साहिब के बेटे जनाब फैसल राहत साहिब ने कहा है इसे मेरा परसनल मैसेज समझें। 

इस मैसेज को मेरा पर्सनल इनविटेशन समझें, वक़्त की कमी के चलते अलग से फ़ोन नहीं कर पा रहा हूँ......

जश्न ए दास्तान 

*राहत साहब की याद में*

एक अनोखा मुशायरा आपका इंतज़ार कर रहा है, ज़रूर तशरीफ़ लाएं.....

13 अगस्त 2022, शाम 05:30 बजे से 

लाभ मंडपम ऑडिटोरियम, अभय प्रशाल के पास, इंदौर

शुक्रिया -

फैसल राहत 

■ Faisal Rahat s/o Dr. Rahat Indori

अब चलते चलते राहत साहिब के अंदाज़ का एक शेयर भी--

हम अपनी जान की दुश्मन को अपनी जान कहते हैं 

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिन्दुस्तान कहते हैं

जो दुनिया में सुनाई दे उसे कहते हैं ख़ामोशी

जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफान कहते हैं

                                           – राहत इंदौरी

Friday, 21 February 2020

निरंतर सक्रिय है लुधियाना का प्रीत साहित्य सदन

साहित्य को अभियान बनाने में जुटा साहित्य प्रेमियों का विशेष ग्रुप 
लुधियाना: 21 फरवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
वाटसअप ग्रुप प्रीत साहित्य सदन 
साहित्य में चलती सियासत से कोसों दूर रहते हुए शुद्ध साहित्य पर अपना ध्यान केंद्रित करने वालों में से एक हैं  लुधियाना के जनाब मनोज कुमार "प्रीत"। यूं तो अक्सर साहित्यिक आयोजनों में भी दिख जाते हैं लेकिन ज़्यादातर उनका ध्यान केंद्रित रहता है "प्रीत साहित्य सदन" पर। कहने को तो यह एक वाटसअप ग्रुप ही है लेकिन वास्तव में यह एक अभियान है-साहित्य समर्पित अभियान। देश और दुनिया के अलग अलग कोनों में रहने वाले साहित्यकारों को एक  पिरोने का अभियान भी। यदि कोई सदस्य जाने अनजाने अपने सियासी प्रचार की  उसे तकरीबन तकरीबन सभी एडमिन बहुत ही प्यार से समझा देते हैं की ऐसा करने की इस ग्रुप में इज़ाज़त नहीं है। ग्रुप में हिंदी साहित्य की चर्चा भी होती है और पंजाबी साहित्य की भी। इसी ग्रुप के ज़रिये हर बार सदन की साहित्यिक बैठक के आयोजन की सूचना भी सदस्यों को दी जाती है। आम तौर पर आयोजन का स्थान भी हर बार वही होता है लुधियाना के समराला चौंक में स्थित सदन का कार्यालय। इन्हीं बैठकों में साहित्य प्रेमी मिल कर बैठते हैं। शायरी का दौर चलता है। साहित्य की चर्चा होती है और कई बार किसी न किसी पुस्तक का विमोचन भी सुनिश्चित।  प्रपत्र भी  और उन पर चर्चा भी होती है। इसी ग्रुप में देश के अन्य स्थानों पर होने वाले आयोजनों की सूचना भी दी जाती है और अन्य विवरण भी। साथ ही शायरी का प्रकाशन भी होता है और साहित्य रस से भरी नोक झोंक भी चलती है। कुल मिला कर यह ऐसा ग्रुप है जो आपको साहित्य से भी जोड़े रखता है  साहित्यकारों से भी। 
इसी ग्रुप में से जनाब सुभाष गुप्ता शफी़क़ साहिब की दो लघु काव्य रचनाएं:
अच्छा हो सकता नहीं उस बस्ती का हाल
बेसन हो सस्ता जहां महंगी चने की दाल
-----------
बोना और फिर सींचना हम को लगे फजूल
ले आये बाजार से हम कागज के फूल
-----------------------

Tuesday, 7 January 2020

जे एन यू के जुगनू//रजनी शर्मा

जेएनयू के छात्रों पर हुए हमले ने साहित्य पर भी प्रभाव डाला 
हमलावरों के हमले में घायल छात्र नेता आईशी घोष 
साहित्य क्षेत्र: 7 जनवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
कलमकार संवेदनशील होते हैं। इसीलिए उन्हें प्राकृति भी अपने सभी रहस्य बहुत आसानी से बता देती है। हर घटना उनके दिल और दिमाग पर असर करती है। जेएनयू में छात्रों पर हुए हमले ने भी उन्हें आंदोलित किया है।एक शायरा रजनी शर्मा ने इस अमानवीय घटना पर एक काव्य रचना लिखी है जिसे हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। --रेक्टर कथूरिया 
जे एन यू के जुगनू//रजनी शर्मा
अचानक नकाबपोश
अंधेरे मे
पहुंच जाते हैं
पकड़ कर डंडे
जे एन यू  के जुगनुओं
को पकड़ने
और गेट अपने आप
खुल जाता है
ताकि अंधेरे में
 उन्हें मसला जाए
सिर फोड़
खून बहाया जाए,
जश्न मनाया जाए,
पर वो क्यों
भूल गए
झूठ की धुन्ध
ज्यादा देर नही टिकती,
सूरज निकलेगा,
फिर उड़ेंगे
ज़ख्मी पर
फिर चमकेंगे
यह जुगनू,
करेंगे अंधेरे का मुँह
और काला।
            ----!!रजनी शर्मा!!

Friday, 3 January 2020

आज के विकास का असली सच बताती प्रो. गुरभजन गिल की काव्य रचना

विज्ञान से भी अधिक सच बताने का प्रयास कर रहा है साहित्य 
साहित्य क्षेत्र: 7 जनवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो):: 
आज के युग का विकास कितना निरथर्क और खोखला सा लगने लगा है इसकी झलक अब आज के साहित्य में भी आने लगी है। डार्विन झूठ बोलता है-एक ऐसी ही रचना है। न कोई विज्ञान, न कोई शोध कार्य लेकिन बात सीधा दिल में उतरती है और इसके लिए कोई प्रमाण भी नहीं मांगती।आप भी पढ़िये और बताईए कि आपको  कैसी लगी यह रचना? आपके विचारों की इंतजार रहेगी ही। बहुत ही गहरी बात कह रही इस काव्य रचना का बहुत ही सशक्त अनुवाद किया है प्रदीप सिंह ने। --रेक्टर कथूरिया 
डार्विन झूठ बोलता है//प्रो. गुरभजन सिंह गिल 
हम विकसित बंदर से नहीं
भेड़ से हुए हैं
भेड़ थे
भेड़ हैं
और भेड़ रहेंगे
जब तक हमें हमारी ऊन की
कीमत पता नहीं चलती।
हमें चराने वाला ही हमें काटता है।
बंदर तो बाज़ार में खरीद-फरोख्त करता
कारोबारी है।
बिना कुछ खर्च किए
मुनाफे का अधिकारी है।
हम दुश्मन नहीं पहचानते
हमारी सोच मरी है।
डार्विन से कहो!
अपने विकासवादी सिद्धांत की
फिर समीक्षा करे!
कि वक़्त बदल गया है।
            -गुरभजन गिल
अनुवाद- प्रदीप सिंह

Monday, 12 November 2018

काव्य रचना//बुतपरस्ती//मंजुल भारद्वाज

October 30 at 10:07 AM
अम्बेडकर का बुत बना--सरकारों ने संविधान रौंद डाला
गांधी के सत और सत्व को 
कांग्रेस ने बुत बना डाला

अम्बेडकर का बुत बना 
सरकारों ने संविधान रौंद डाला

अखंडता के पाखंडी संघी 
देश को करते रहे लहूलुहान
घृणा,नफ़रत के सौदागर ने
3000 करोड़ में 600 फीट का 
चीन के साथ मिलकर 
सरदार का बुत बना डाला

स्वतन्त्रता के सिपाहियों की 
भयावह त्रासदी है यह 
बुतपरस्त देश ने 
उनके आदर्शों को 
मटियामेट कर डाला!