Friday, 16 July 2021

मुंशी प्रेमचंद जी की स्मृति में विशेष गोष्ठी शनिवार को

 महिला काव्य मंच लुधियाना का विशेष आयोजन 17 जुलाई को 


लुधियाना: 16 जुलाई 2021 (कार्तिका सिंह//साहित्य स्क्रीन)::

कोई ज़माना था जब किसी न किसी बड़े संस्थान के हाल या खुले प्रांगण में साहित्य की चर्चा भी हुआ करती थी हुए साहित्य की रचनाओं को भी पढ़ा सुना जाता था। साथ में देश और दुनिया की चर्चा भी चला करती थी और साथ ही समोसा, गुलाब जामुन और चाय का दौर भी चला करता था। जब से कोरोना का यह भयानक प्रकोप शुरू हुआ तब से लॉकडाऊन ने सारे के  सारे हालात ही बदल दिए। सिर्फ हालात ही नहीं सभी रीति रिवाज भी बदल दिए। पहले की तरह आयोजन अब भी होते हैं लेकिन न तो अब आप गले मिल सकते हैं न ही हाथ मिला सकते हैं न ही सट कर साथ साथ बैठ सकते हैं। कोविड के नियमों की पालना सख्ती से होने लगी है। आप अपने अपने घर में बैठते हैं और अपने फोन, कम्प्यूटर या लैपटॉप का कैमरा खोलते हैं और अपनी बरी आने पर शुरू हो जाते हैं बिलकुल उसी तरह जैसे किसी हाल या प्रांगण में बोलै करते थे।  

इस बार 17 जुलाई 2021 के लिए एडवांस में ही शुभ संध्या कहते हुए पूनम सपरा और उनकी सहयोगी टीम की अन्य न मान्यवर सदस्यों ने आप को निमंत्रित किया है उनके ऑनलाइन साहित्यिक आयोजन को देखने सुनने के लिए। 

17 जुलाई को होने वाली मुंशी प्रेमचंद स्मृति काव्य/कथा गोष्ठी के लिए जिस जिस को भी बुलाया गया है उसे निम्न क्रमांक के अनुसार बुलाया जाएगा। निवेदन किया गया है कि आप सभी अपनी अपनी एक ही रचना के साथ तैयार रहें। रचना बिना किसी भूमिका के पढ़ें और तीन/चार मिनट से ज्यादा समय न लें।

प्रतिभागियों के नाम इस प्रकार रहेंगे:1. शालू, 2. शैली वधवा,3. मोनिका कटारिया, 4. पूर्वा सिंह (लघुकथा),  5. डॉ. मोनिका शर्मा, 6. श्रद्धा शुक्ला, 7. नीलू ठाकुर, 8. रश्मि अस्थाना (लघुकथा), 9.मोनिका चौधरी, 10. शालिनी मित्तल, 11.राधा शर्मा, 12.सीमा वर्मा (लघुकथा),13. रचना गुलाटी,14. सविता खोसला,15. अनुराधा कटारिया,16.नैंसी शर्मा (लघुकथा), 17.विभा कुमारिया शर्मा, 18. अर्चना खापरान, 19. ममता जैन, 20.पूनम सपरा(समीक्षा), 21. डा. मोनिका शर्मा डोगरा, 22.श्रुति, 23.ममता वढेरा, 24.क्षमा लाल गुप्ता (समीक्षा), 25. इरादीप त्रेहन, 26.बेनु सतीशकांत, 27.सीमा भाटिया, 28.सवीना वर्मा सवी।  इस अवसर पर मंच संचालन करने की ज़िम्मेदारी  छाया शर्मा और श्रद्धा शुक्ला की रहेगी। 

जब लोग घरों में बैठे बैठे अपने अपने अकेलेपन और उदासी से दो चार हो रहे हैं उस माहौल में लोगों को मानसिक तौर पर नया उत्साह देने के लिए यह एक विशेष अर्थपूर्ण प्रयास है। यह साहित्य को अमीर तो करेगा ही साथ ही दूरियों के इस ज़माने में भी लोगों को एक दुसरे के नज़दीक ले कर आएगा। 

आपको यह आयोजन कैसा लगेगा इसे बताना न भूलें। --कार्तिका सिंह 

Sunday, 27 June 2021

"नारीवादी निगाह से" गंभीर मुद्दे हैं निवेदिता मेनन की इस पुस्तक में

 14th June 2021 at 3:33 PM

 बहुत सी समस्याओं को उठाती है निवेदिता मेनन की यह पुस्तक 


नई दिल्ली//लुधियाना//:27 जून 2021: (साहित्य स्क्रीन डेस्क):: 

विवाह होता है तो इस को बहुत ही शगुन भरा घटनाक्रम माना जाता है। लेकिन इसे कभी भी नारीवादी नज़रिये से देखा ही नहीं गया। एक लड़की को उसके घर परिवार से अलग कर के कोई बेगाना घर अपनाने की रस्म है विवाह जिसमें लड़की को लाने वाले ढोल बजाते हैं जैसे अपना जय घोष कर रहे हों। यहीं से शुरू हो जाती है नारी की क़ुरबानी। कई बार तो उसका नाम भी बदल दिया जाता है। लड़की के साथ साथ खुले या छुपे रूप में दहेज की मांग भी की जाती है। पितृसत्ता के दौर में इस सारे घटनाक्रम को नाम दिया जाता है कि लड़की का घर बसा दिया। नारी के जीवन में, उसकी मानसिकता में कितनी उलझनें पैदा होती हैं यह वही जानती है। समाज तो बस दूर से तमाशा ही देखता है। आम तौर पर इस सारे दर्द को नज़र अंदाज़ भी कर दिया जाता है। निवेदिता मेनन ने "सीइंग लाईक ए फेमिनिस्ट" अंग्रेजी में इन्हीं बहुत से सवालों को ले कर लिखी थी। अंग्रेजी की अपनी पहुँच है लेकिन बहुत से लोग हैं जो हिंदी को पसंद करते हैं। अच्छा हो इसका पंजाबी अनुवाद भी प्रकाशित हो। हिंदी में जह छपा है "नारीवादी निगाह से" और बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है।  

इस किताब की बुनियादी दलील नारीवाद को पितृसत्ता पर अन्तिम विजय का जयघोष सिद्ध नहीं करती। इसके बजाय वह समाज के एक क्रमिक लेकिन निर्णायक रूपान्तरण पर ज़ोर देती है ताकि प्रदत्त अस्मिता के पुरातन चिह्नों की प्रासंगिकता हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए। नारीवादी निगाह से देखने का आशय है मुख्यधारा तथा नारीवाद, दोनों की पेचीदगियों को लक्षित करना। यहाँ जैविक शरीर की निर्मिति, जाति-आधारित राजनीति द्वारा मुख्यधारा के नारीवाद की आलोचना, समान नागरिक संहिता, यौनिकता और यौनेच्छा, घरेलू श्रम के नारीवादीकरण तथा पितृसत्ता की छाया में पुरुषत्व के निर्माण जैसे मुद्दों की पड़ताल की गई है। एक तरह से यह किताब भारत की नारीवादी राजनीति में लम्बे समय से चली आ रही इस समझ को दोबारा केन्द्र में लाने का जतन करती है कि नारीवाद का सरोकार केवल ‘महिलाओं’ से नहीं है। इसके उलट, यह किताब बताती है कि नारीवादी राजनीति में कई प्रकार की सत्ता-संरचनाएँ सक्रिय हैं जो इस राजनीति का मुहावरा एक दूसरे से अलग-अलग बिन्दुओं पर अन्तःक्रिया करते हुए गढ़ती हैं।

पेपरबैक संस्करण 240 पेज का है और कीमत है 275/- रुपए।  जिल्द का डीलक्स एडिशन है 299/-रुपए का।इसका हिंदी अनुवाद बहुत सुंदर है और इस ज़िम्मेदारी को निभाया है नरेश गोस्वामी ने। 

पुस्तक चर्चा के लिए आप भी पुस्तकें, पुस्तक रिलीज़ निमंत्रण, आयोजन की खबरें, आयोजन की रिपोर्टें और तस्वीरें भेज सकते हैं। कवरेज टीम को बुलाने के लिए अग्रिम सूचना आवश्यक है। इस मकसद के लिए फोन और ईमेल दोनों से सम्पर्क कर सकते हैं। 

ईमेल है: medialink32@gmail.com और WhatsApp है:+919915322407 

Friday, 29 May 2020

हम देखेंगे//फैज़ अहमद फैज़ साहिब

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ
रूई की तरह उड़ जाएँगे
हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिस का वादा है जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ रूई की तरह उड़ जाएँगे हम महकूमों के पाँव-तले जब धरती धड़-धड़ धड़केगी और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगे सब तख़्त गिराए जाएँगे बस नाम रहेगा अल्लाह का जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी जो मंज़र भी है नाज़िर भी उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो (--फैज़ अहमद फैज़ साहिब)

Friday, 21 February 2020

निरंतर सक्रिय है लुधियाना का प्रीत साहित्य सदन

साहित्य को अभियान बनाने में जुटा साहित्य प्रेमियों का विशेष ग्रुप 
लुधियाना: 21 फरवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
वाटसअप ग्रुप प्रीत साहित्य सदन 
साहित्य में चलती सियासत से कोसों दूर रहते हुए शुद्ध साहित्य पर अपना ध्यान केंद्रित करने वालों में से एक हैं  लुधियाना के जनाब मनोज कुमार "प्रीत"। यूं तो अक्सर साहित्यिक आयोजनों में भी दिख जाते हैं लेकिन ज़्यादातर उनका ध्यान केंद्रित रहता है "प्रीत साहित्य सदन" पर। कहने को तो यह एक वाटसअप ग्रुप ही है लेकिन वास्तव में यह एक अभियान है-साहित्य समर्पित अभियान। देश और दुनिया के अलग अलग कोनों में रहने वाले साहित्यकारों को एक  पिरोने का अभियान भी। यदि कोई सदस्य जाने अनजाने अपने सियासी प्रचार की  उसे तकरीबन तकरीबन सभी एडमिन बहुत ही प्यार से समझा देते हैं की ऐसा करने की इस ग्रुप में इज़ाज़त नहीं है। ग्रुप में हिंदी साहित्य की चर्चा भी होती है और पंजाबी साहित्य की भी। इसी ग्रुप के ज़रिये हर बार सदन की साहित्यिक बैठक के आयोजन की सूचना भी सदस्यों को दी जाती है। आम तौर पर आयोजन का स्थान भी हर बार वही होता है लुधियाना के समराला चौंक में स्थित सदन का कार्यालय। इन्हीं बैठकों में साहित्य प्रेमी मिल कर बैठते हैं। शायरी का दौर चलता है। साहित्य की चर्चा होती है और कई बार किसी न किसी पुस्तक का विमोचन भी सुनिश्चित।  प्रपत्र भी  और उन पर चर्चा भी होती है। इसी ग्रुप में देश के अन्य स्थानों पर होने वाले आयोजनों की सूचना भी दी जाती है और अन्य विवरण भी। साथ ही शायरी का प्रकाशन भी होता है और साहित्य रस से भरी नोक झोंक भी चलती है। कुल मिला कर यह ऐसा ग्रुप है जो आपको साहित्य से भी जोड़े रखता है  साहित्यकारों से भी। 
इसी ग्रुप में से जनाब सुभाष गुप्ता शफी़क़ साहिब की दो लघु काव्य रचनाएं:
अच्छा हो सकता नहीं उस बस्ती का हाल
बेसन हो सस्ता जहां महंगी चने की दाल
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बोना और फिर सींचना हम को लगे फजूल
ले आये बाजार से हम कागज के फूल
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Tuesday, 7 January 2020

जे एन यू के जुगनू//रजनी शर्मा

जेएनयू के छात्रों पर हुए हमले ने साहित्य पर भी प्रभाव डाला 
हमलावरों के हमले में घायल छात्र नेता आईशी घोष 
साहित्य क्षेत्र: 7 जनवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
कलमकार संवेदनशील होते हैं। इसीलिए उन्हें प्राकृति भी अपने सभी रहस्य बहुत आसानी से बता देती है। हर घटना उनके दिल और दिमाग पर असर करती है। जेएनयू में छात्रों पर हुए हमले ने भी उन्हें आंदोलित किया है।एक शायरा रजनी शर्मा ने इस अमानवीय घटना पर एक काव्य रचना लिखी है जिसे हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। आपको यह रचना कैसी लगी अवश्य बताएं। --रेक्टर कथूरिया 
जे एन यू के जुगनू//रजनी शर्मा
अचानक नकाबपोश
अंधेरे मे
पहुंच जाते हैं
पकड़ कर डंडे
जे एन यू  के जुगनुओं
को पकड़ने
और गेट अपने आप
खुल जाता है
ताकि अंधेरे में
 उन्हें मसला जाए
सिर फोड़
खून बहाया जाए,
जश्न मनाया जाए,
पर वो क्यों
भूल गए
झूठ की धुन्ध
ज्यादा देर नही टिकती,
सूरज निकलेगा,
फिर उड़ेंगे
ज़ख्मी पर
फिर चमकेंगे
यह जुगनू,
करेंगे अंधेरे का मुँह
और काला।
            ----!!रजनी शर्मा!!

Friday, 3 January 2020

आज के विकास का असली सच बताती प्रो. गुरभजन गिल की काव्य रचना

विज्ञान से भी अधिक सच बताने का प्रयास कर रहा है साहित्य 
साहित्य क्षेत्र: 7 जनवरी 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो):: 
आज के युग का विकास कितना निरथर्क और खोखला सा लगने लगा है इसकी झलक अब आज के साहित्य में भी आने लगी है। डार्विन झूठ बोलता है-एक ऐसी ही रचना है। न कोई विज्ञान, न कोई शोध कार्य लेकिन बात सीधा दिल में उतरती है और इसके लिए कोई प्रमाण भी नहीं मांगती।आप भी पढ़िये और बताईए कि आपको  कैसी लगी यह रचना? आपके विचारों की इंतजार रहेगी ही। बहुत ही गहरी बात कह रही इस काव्य रचना का बहुत ही सशक्त अनुवाद किया है प्रदीप सिंह ने। --रेक्टर कथूरिया 
डार्विन झूठ बोलता है//प्रो. गुरभजन सिंह गिल 
हम विकसित बंदर से नहीं
भेड़ से हुए हैं
भेड़ थे
भेड़ हैं
और भेड़ रहेंगे
जब तक हमें हमारी ऊन की
कीमत पता नहीं चलती।
हमें चराने वाला ही हमें काटता है।
बंदर तो बाज़ार में खरीद-फरोख्त करता
कारोबारी है।
बिना कुछ खर्च किए
मुनाफे का अधिकारी है।
हम दुश्मन नहीं पहचानते
हमारी सोच मरी है।
डार्विन से कहो!
अपने विकासवादी सिद्धांत की
फिर समीक्षा करे!
कि वक़्त बदल गया है।
            -गुरभजन गिल
अनुवाद- प्रदीप सिंह

Wednesday, 1 January 2020

डा. राजेन्द्र टोकी को मिला उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान का "सौहार्द सम्मान"

पंजाब प्रदेश की खन्ना तहसील में रहते हैं राजेंद्र टोकी 
खन्ना//लुधियाना: 31 दिसंबर 2020: (साहित्य स्क्रीन ब्यूरो)::
उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा  पंजाब प्रदेश की खन्ना तहसील में रहने वाले सतत् स्वाध्यायशील एवं यशस्वी साहित्यकार डा. राजेन्द्र टोकी को  2 लाख रु. राशि वाला *सौहार्द सम्मान* प्रदान किया गया है।  
अपनी भलमनसाहत के लिए विख्यात डॉ. राजेन्द्र टोकी की गणना भारतीय जीवन-मूल्यों के संवाहक और लेखन व शिक्षा के प्रति आस्थावान व्यक्तित्वों में होती है। रचना, आलोचना, अनुवाद, अनुसन्धान, सम्पादन आदि उनके कृतित्त्व के कई पहलू हैं| कविता, ग़ज़ल, कहानी, निबन्ध जैसी विधाओं में रचनात्मक लेखन के 
अतिरिक्त उर्दू व पंजाबी से हिन्दी अनुवाद, सम्पादन और आलोचनाकर्म में तल्लीन रहते हुए उन्होंने लगभग 
42 पुस्तकों के माध्यम से साहित्य-भण्डार में श्रीवृद्धि की है। टोकी जी द्वारा  "ओउम् जय जगदीश हरे"  आरती के रचयिता पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी पर गम्भीर अनुसन्धानपरक कार्य किया है| लुधियाना शहर के सीमान्त पर बसे 'फिल्लौर' कस्बे में रहने वाले श्रद्धाराम फिल्लौरी की हिन्दी, संस्कृत, उर्दू और पंजाबी की अनुपलब्ध रचनाओं के अन्वेषण के पश्चात् किया गया यह कार्य निश्चित ही श्रमसाध्य एवं सर्वोत्कृष्ट कार्य है। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा राजेन्द्र टोकी जी को वर्ष-2018 के लिए "सौहार्द सम्मान" दिए जाने से ईमानदार लेखन की प्रति आस्था और उत्साह जगा है। निश्चित ही पुरस्कार की गरिमा भी बढ़ी है। इसके लिए 'उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ' की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की जानी चाहिए। राजेन्द्र टोकी जी को "सौहार्द सम्मान" मिलने पर साहित्य स्क्रीन परिवार की तरफ से भी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।